झारखण्ड में यूपीए गठबंधन का पेंच

रांची:

झारखण्ड में स्थिति अभी भी साफ़ नहीं हो पायी है कि कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए का भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व वाली एनडीए के खिलाफ कोई ठोस गठबंधन बनने जा रहा है या नहीं.

हालाकि दक्षिण भारत के एक नेता चंद्राबाबू नायडू ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ यह कह दिया कि अब यूपीए का गठबंधन समय की जरूरत है.

सूत्रों के अनुसार यही बात झारखण्ड विकास मोर्चा के सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ने पिछले दिनों राहुल गांधी से कहा था जब वे दिल्ली में उनसे मिले थे.

पर बात नहीं बन पायी.

जानकारी के मुताविक झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन उन दिनों दिल्ली में ही थे लेकिन वे बाबूलाल मरांडी के साथ राहुल गांधी से मिलने नहीं गए.

मरांडी चाहते थे कि बैठकर बात हो और समय से पहले झारखण्ड में भी जेवीएम, जेएमएम, कांग्रेस तथा राजद का एक गठबंधन बन जाए ताकि कार्यकर्ता पूरे मन से भाजपा के खिलाफ 2019 का मोर्चा खोल दें.

बाबूलाल ने “बॉर्डर न्यूज़” से कहा कि उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को यह सलाह दी कि अभी यदि गठबंधन की रूप रेखा तैयार हो जाती है तो सभी विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं को आगे के काम में मन लगेगा और उत्साह भी बढेगा.

उन्होंने कहा कि राहुल ने उनके इस विचार को बहुत ही गंभीरता से लिया और झारखण्ड के प्रभारियों को कुछ निर्देश भी दिए.

फिर भी राजनीतिक गलियारों में यह बात स्पस्ट नहीं हो पा रही है कि झारखण्ड की एक सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी- झारखण्ड मुक्ति मोर्चा इस ओर आगे बढ़ने में क्यों हिचकिचा रही है?

दुमका के सांसद और जेएमएम सुप्रीमो शिबु सोरेन हलाकि यह एलान कर चुके हैं कि इस बार भाजपा को पराजित करना है, लेकिन यह स्पस्ट नहीं कर रहे कि उनकी पार्टी किसी विपक्षी गठबंधन के साथ चुनाव लडेगी या फिर अकेले ही मैदान में उतरेगी या फिर अपने हिसाब से चुनाव परिणामों के बाद यूपीए या एनडीए से जुड़ जाएगी.

झारखंड में लोकसभा की मात्र 14 सीटें हैं और एक प्रकार से सभी सीटों पर यह तय है कि विपक्ष का कौन नेता कहाँ से चुनाव लडेगा. फिर भी सभी दावा ही पेश कर रहे हैं.

यूपीए की राजनीति में झारखण्ड के अन्दर गठबंधन का जो विलम्ब हो रहा है उसका भाजपा एक बड़ा लाभ उठा सकती है.

हो सकता है कि कांग्रेस मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाओं का इन्तजार कर रही हो; लेकिन बिहार में तो भाजपा ने अपनी सीटों का तालमेल  लगभग पूरा कर लिया है.

जानकारों के अनुसार राजनीति सही समय में सही फैसले लेने से ही आगे बढ़ती है, विलम्ब और हिचक किसी भी दल को पीछे रखकर उसे अगले पांच साल के लिए फिर से चुनावी मैदान से किनारे कर सकता है.

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