नोटा एक आक्रोश है, विकल्प नहीं बन सकता

हाल के दिनों में मतदान के दौरान नोटा बटन दबाने की एक आबाज उठी. आखिर यह राजनीति क्या है, जिसे समझा रही हैं पत्रकार मोनिका अग्रवाल

 

सियासी चिंतन व प्रवृत्ति में आये परिवर्तन ने आवाम को एक ऐसे मोड़ पर खडा कर दिया है जहां वह अपने को केवल ठगा सा महसूस कर रहा है।

देश में लोकतंत्र के सात दशक के सफर ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं जिसमें कभी गैर कांग्रेस वाद तो कभी गैरभाजपावाद का नारा भी शामिल रहा है। इस बीच देश कभी आपातकाल का गवाह बना तो कभी सत्ताप्राप्ति के लिए अवसरवादी राजनीतिक गठजोड़ों का। सियासत कभी प्राकृतिक तो कभी अवसरवादी परिर्तन से रूबरू हुई, लेकिन इसमें लोकतंत्र का सबसे अहम किरदार मतदाता हाशिए पर ही रहा। सियासत में हो रहे इस परिवर्तन ने मतदाताओं को निराश ही किया। अवसरवादी परिवर्तन ने राजनेताओं को तो सत्ता की चासनी दी लेकिन मतदाता को मृगमरीचिका से अधिक कुछ भी हासिल नहीं हो सका।

चुनाव दर चुनाव आवाम को वायदों का झुनझुना तो थमाया जाता रहा, लेकिन उन्हें आकार देने की कोशिशें पूरी तरह से धरातल पर नहीं उतर सकीं। कभी उसमें सियासी इच्छाशक्ति आड़े आ गई तो कभी राजनेताओं की नेकनीयती बाधक बन गई।

ऐसा भी नहीं है कि सात दशक के इस सफर में देश का विकास ही नहीं हुआ। देश विकास पथ पर तो आगे बढ़ता रहा लेकिन आम आदमी के जिस परिमाणात्मक व गुणात्मक विकास की उम्मीद थी, वह पूरी नहीं हो सकी। खासकर किसान विकास की दौड़ में हमेशा ही पीछे रहा और कमोवेश यह स्थिति आज भी कायम है। वजह यह है कि सियासी वायादाबाजी ने उसे सब्जबाग तो दिखाए और इसी सब्जबाग से उत्पन्न लहर पर सवार होकर सत्ता भी हासिल की, लेकिन सत्ता में आने के बाद राजनीतिक दलों ने विकास की जो प्राथमिकताएं तय की उसमें बेचारा किसान काफी पीछे की कतार में खड़ा दिखा।

देश की प्रकृति पर निर्भरता भी किसान के पिछड़ेपन का एक अहम कारण रही। इसके परिणामस्वरूप किसान कभी सियासी इच्छाशक्ति की बेदी पर कुर्बान हो गया तो कभी प्रकृति ने उसकी तरक्की को ग्रहण लगा दिया। परिणामस्वरूप वह आज भी कभी ईश्वर तो कभी सियासी निजाम की ओर आशा भरी नजरों से देखने को विवश है। देश का बड़ा हिस्सा आज भी आजीविका की द़ष्टि से कृषि पर आश्रित है। विकास की दौड़ में सबसे फिसड्डी रहने के बाद भी किसान चुनावी व्यवस्था का अहम हिस्सा बना रहा, लिहाजा हर पांच साल बाद सत्ता की चाबी उसके पास आती रही। यही नहीं उसने अपने विवेक का परिचय देते हुए समय समय पर अनेक अहम परिवर्तन भी किया लेकिन कभी चुनाव पूर्व तो कभी चुनाव बाद हुए गठबंधनों ने जनादेश को धता बाताकर अथवार उसकी अजीबोगरीब व्याख्या कर सत्ता हथिया ली। परिणामत: चुनावी तिकड़मबाजी के आगे आवाम से जुड़ी प्राथमिकताएं बौनी साबित हो गई।

 


राजनीतिक दलों से निराश आवाम को एक ऐसे विकल्प की तलाश है जो उसके हितों की रक्षा करने में सक्षम हो। इस बीच आवाम को नोटा का विकल्प मिला भी, जिसका प्रयोग कर वह चुनाव के दौरान वह राजनीतिक दलों के नुमाइंदों को सबक सिखा सकाता है। हालाकि दूसरा सच यह भी है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में नोटा को अभी प्रासंगिकता की कसौटी पर कसा जाना शेष है।

नोटा एक ऐसी व्यवस्था है जिसके माध्यम से मतदाता अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकता है लेकिन नोटा आम जनमानस के उद्गार के प्रकटीकरण का माध्यम बन उसकी समस्याओं के निराकरण व लोकतांत्रिक व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में अपनी समुचित भूमिका निभा सकेगा, इसका परीक्षण किया जाना अभी शेष है। किसी भी देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जादुई आंकढ़े का अपना महत्व है, सत्ता में आने व उसमें बने रहने के लिए उस जादुई आंकड़े तक पहुंचना व वहां बने रहना पहली शर्त है।

देश का सात दशक का सियासी सफर इसी जादुई आंकड़े को पाने की जिदओजेहद में पूरा होता रहा है। पर सवाल यह है कि क्या जिस अवधारणा के तहत नोटा को मतदाताओं के समक्ष विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है, भारत सरीखे विकासशील देश में लोकतंत्र की उस मूल भावना के अनुरूप नोटा प्रासंगिक भी है अथवा नहीं।

देश को विकास पथ पर ले जाने के लिए जिस इच्छाशक्ति व नेकनीयती की जरूरत है, वह कैसे पूरी हो यह सियासी निजाम की प्राथमिकता है। सरकारें इसके मद्देनजर ही आचरण भी करती रही हैं, ये अलग बात है कि भ्रष्टाचार के घुन ने विकास की गति को ही मंद किया है। मौजूदा सरकार किसानों व गरीबों का जीवनस्तर ऊंचा उठाने व उनकी आय बढ़ाने की जिदओजेहद कर रही है, लेकिन लोगों के जीवनस्तर में सुधार की जो गति अपेक्षित थी वह अभी पूरी नहीं हो पाई है। इसके लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

नोटा लोगों के आक्रोश के प्रकटीकरण का एक माध्यम तो हो सकता है लेकिन वह कोई राजनीतिक विकल्प बन सके, इसकी संभावना भी कम ही है। नोटा विरोध का बायस तो हो सकता है लेकिन सियासी निजाम का विकल्प नहीं। दूसरा सवाल यह भी है कि आवाम का कितना हिस्सा नोटा का हमकदम होता है, यह भी एक अहम विषय होगा। निर्वाचन के जो मौजूदा मापदंड हैं उनके सापेक्ष क्या नोटा को प्राथमिकता मिलेगी? और मिलेगी भी तो कितने स्थानों पर?

यह भी सोचना  होगा कि क्या नोटा आवाम के लिए चुनावी विकल्प बन सकता है अथवा विकल्प बन सकता है अथवा नोटा का प्रयोग सियासी अस्थिरता को ही बढ़ाएगा। क्योंकि सच यही है कि सियासी प्रयोगधर्मिता के चलते देश को सियासी अस्थिरता की आग में नहीं झोंका जा सकता।

 

 

 

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