बिहारी राजनीति के बेहतरीन खुराक होते हैं

पटना:

सभ्यता के आरंभिक काल से अब तक भूख मिटाने की तलाश में जबकि करोड़ो इंसान दुनियां में स्थिर हो चुके हैं, बिहारी आज भी चलता चला जा रहा है.

भारत के कुछ राज्यों- खासकर गुजरात और महाराष्ट्र- में बिहारियों के साथ जो अमानवीय व्यवहार की ख़बरें आ रही हैं उसने इन्हें मानो घृणा की वस्तु बना दिया. वे दूर से ही पहचान लिए जाते हैं. पलायन इनकी नियति है और ये अब राजनीति के लिए एक बेहतरीन खुराक भी बनते जा रहे हैं.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित बिहार के तमाम बड़े नेताओं की जुबान पर बिहार के सिर्फ वे दिन ही याद आते हैं जब यहाँ भगवान बुद्ध को ज्ञान मिला और महात्मा गांधी को राजनीतिक कर्म के लिए एक जमीन मिला.

नीतीश कुमार ने, पता नहीं गांधी वांग्मय के उस अंश को कभी पढ़ा या नहीं जिसमें 1946 में महात्मा गांधी ने खुद कहा कि बिहार के बारे में उनके सारे भ्रम टूट गाए. मुद्दा देश में बंटवारे से पूर्व भयानक दंगे का था, गांधी बंगाल के नोआखाली संभाल रहे थे और बिहार में हो रहे दंगे को रोकने के लिए एक बार तो ब्रिटिश पुलिस को हवाई जहाज से भी बम गिरना और फायरिंग भी करना पडा था.

बिहार के जब भोजपुरी साहित्य को आप पढेंगे तो उनमें एक बिहारी के कलकत्ता से मोरिसस जाकर मजदूर बन जाने की दर्जनों कहानियां मिल जाएंगीं.

बिहार के नेता यह भी कभी नहीं कहना भूलते कि पंजाब को बिहारी मजदूरों ने समृद्ध बनया.

अब जबकि गुजरात से बिहारियों को भगाया जा रहा है तो लोग यही सवाल सरकार से भी कर रहे हैं कि बिहार की अबतक की सरकारों ने उन बिहारियों को बिहार बनाने का मौका क्यों नहीं दिया जिन्होंने पंजाब को बनाया और अब गुजरात और महाराष्ट्र को बना रहे हैं?

जबकि महाराष्ट्र के किसान भूख मर रहे हैं और आन्दोलन पर उतारू हैं तो बिहार के किसी भी स्थान से किसानों के भूख से मरने की खबर नहीं आती है. बिहार के किसान कर्ज माफी के लिए झूठ मूठ का सड़कों पर नहीं उतरते और न ही रेलों की पटरियों को उखाड़ते.

तो फिर ऐसा क्या हो गया कि बिहार की जमीन के समृद्ध होने के बावजूद मजदूर पलायन कर गए. 70 से 90 के दशकों के बीच भोजपुर और उत्तर बिहार के इलाके में जमींदारों और किसानों के बीच के संघर्षों में जो नरसंहार हुए उसने बिहारी मजदूरों को अपने घरों में जमने का मौका ही नहीं दिया. वाम दलों ने अपने लिए खूब रोटियां सेंकी पर वे मजदूरों को पलायन से नहीं बचा सके. लोग अपनी इज्जतों के लुट जाने और जान के खो जाने की डर से भाग गए.

1990 से 2000 के बीच लालू राज में बिहार से इंसानों का सबसे अधिक पलायन हुआ. सरकार के पास इसकी कोई रिपोर्ट नहीं है कि आखिरकार कितने बिहारी राज्य छोड़ कर गए. सरकार ने इसकी कभी जरूरत भी नहीं समझी और कोई लेखा जोखा भी नहीं रखा. लालू राज के दौरान अपहरण के भय से हजारों की संख्या में उद्योगपति भाग गए. बाहर की दुनियां में बिहार ने इस अपराध के लिए जो भरोसा खोया वह आज भी वापस नहीं मिला है. इसका खामियाजा राज्य के बहार उन बिहारियों को भोगना पडा जो मेहनत मजदूरी करने गए थे.

यही वह पिन पॉइंट है जिसपर कोई बहस नहीं करना चाहता. नीतीश कुमार के राज में पढ़े लिखे लड़के भाग रहे हैं. लाखों की संख्या में जो बिहारी लड़के –लड़कियां बंगलौर, पूना, कलकत्ता, नागपुर, अहमदाबद, हैदराबाद और दिल्ली चले गए क्या वे अपने घर अब वापस आयेंगे? यह सिलसिला आज भी जारी है. नीतीश अपने लम्बे शासन में एक भी ऐसे लड़के-लड़कियों को अपने घर नहीं रोक सके जो आधुनिक दुनिया को बदलने में कदम से कदम मिला रहे हैं.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए वे सामजिक कार्यक्रम जरूरी हैं जिनमें उन्हें उनकी सरकार के बने रहने और भविष्य में फिर से बरकारार रहना ही जरूरी लगता है. भजपा उनकी पिछलग्गू बनी हुई है. ऐसे कार्यक्रम न तो भूख को रोक पाए और न ही ज्ञान को, तो बिहारियों का चलते रहना जरी ही रहेगा.

 

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