संथाल की राजनीति में निशिकांत का “जंगा -आरुअ”

गोड्डा (संथाल परगना):

संथाल समाज में एक प्रथा है- जब कोई बड़े-बुजुर्ग या मेहमान थके- हारे गाँव पहुचते हैं तो लोग एक थाली में उनके पैर को रखकर शीतल जल से उसे धोते हैं.

जानकारी के मुताविक संथाल समाज में इसे “जंगा आरुअ” (जंगा मतलब पैर आरुअ मतलब पखारना) कहते हैं. लेकिन पैर धोने वाला व्यक्ति कभी भी इस पानी को नहीं पीता.

भारतीय जनता पार्टी की संस्कृति में इसे “चरणामृत” कहा जाता है, लेकिन इसमें किसी थके-हारे समाज के आदरणीय इन्सान के पैर नहीं धोये जाते; यहाँ आदर की वह चरम सीमा होती है जिसमें भक्त अपने कथित चाहने वालों के पैर धो कर उस पानी को पी जाते हैं, जिसे “चरणामृत” कहा जाता है.

भारतीय जनता पार्टी के गोड्डा से सांसद निशिकांत दुबे ने इसी “चरणामृत परम्परा की शुरुआत की जब वे एक पुल का शिलान्यस करने अपने संसदीय क्षेत्र पहुचे.

भू-वैज्ञानिक दृष्टि से जो रिपोर्ट झारखण्ड सरकार के पास है उसमें यह देखा गया है कि गोड्डा जिला जो संथाल परगना में आता है, झारखण्ड का वह भू-भाग है जहाँ जमीन के अन्दर से पानी सबसे ज्यादे खिसक चुकी  है.

निशिकांत दुबे पिछले 2004 से संथाल परगना में राजनीति कर रहे हैं. 2004 में उन्होंने पहली बार चुनाव लड़ा और जीते. फिर 2009 में भी जीते. लेकिन गोड्डा की एक सबसे बड़ी समस्य- कझिया नदी पर पुल का बनाना रही है, उसका शिलान्यास उन्होंने इस 16 सितम्बर को किया, जबकि अगला लोकसभा चुनाव होना है.

उनके शिलान्यास कार्यक्रम के दौरान भाजपा का एक स्थानीय कार्यकर्ता पवन कुमार साह ने सांसद निशिकांत का पैर धोया और इसे “चरणामृत” समझकर पी लिया.

निशिकांत ने तो देश की भाजपा संस्कृति में अपने भक्तों के लिए एक नयी संस्कृति को जन्म दे दिया. अपने बचाव में निशिकांत ने सोशल मीडिया के द्वार इस घटना के बारे में यह कहा कि किसी दिन पवन जैसे कार्यकर्ता का चरणामृत लेने का सौभाग्य मुझे मिलेगा क्योंकि इन्हीं लोगों के कारण मैं आज ज़िंदा हूँ.

पिछले 9 साल में निशिकांत ने शायद ही एक आम मतदाता को अपने पास फटकने दिया होगा. गोड्डा के सांसद रहते हुए वे शायद ही कभी गोड्डा शहर जाते हैं. वे मुख्यरूप से देवघर से ही अपना बयान जारी करते रहे हैं. देवघर गोड्डा संसदीय क्षेत्र में आता है. उनेक बयान बहुत भारी-भरकम योजनाओं वाले होते हैं जिनमें देवघर में एक अंतर्राष्ट्रीय एअरपोर्ट, एम्स, रेल परियोजनाएं आदि आदि. यह सब चुनाव के पूर्व संध्या पर चल रहा है.

वैसे निशिकांत को एक अच्छे सांसद का खिताब मिला है. उनकी अच्छाई का एक बड़ा उदाहरण भागलपुर –हंसडीहा-दुमका पैसेंजर ट्रेन भी है जिसका उद्घाटन लगभग तीन साल पहले उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र गोड्डा के पास हंसडीहा में किया था. “रेलवे ने जो ट्रेन यहाँ के यात्रियों के लिए दिया है उसमें एक भी बाथरूम नहीं है. मजबूर होकर महिलाओं और बच्चों को कम्पार्टमेंट में ही पेशाब करना पड़ता है. यही भाजपा का स्वछता अभियान है,” ट्रेन पर सफ़र करने वाले यात्रियों ने ऐसी शिकायत कई बार रेलवे अधिकारीयों से की है.

निशिकांत झारखण्ड के संथाल परगना में राजनीति करते हैं. उन्होंने खुद को संथाली परम्परा से दूर कर एक नहीं परम्परा की शुरुआत चुनावी राजनीति में कर दी है. हो सकता है कि भाजपा के कुछ और बड़े नेता इसका अनुकरण करें!

निशिकांत ने कहा कि पिछले 9 साल में उन्होंने अपने संसदीय इलाके में किसी को भी ठेका –पट्टा नहीं दिया.

जब उनके “चरणामृत” को पीया गया तो उन्होंने कहा कि आज वे खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहे हैं. वह भी किसी दिन एक कार्यकर्ता के ‘चरणामृत’ पीयेंगे.

“चरणामृत” पीने वाले पवन साह ने इसे खुद का सौभाग्य बताया.

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