वैचारिक विपन्नता की दहलीज पर सियासत का खेल

(मोनिका अग्रवाल)

भारतीय राजनीति आज वैचारिक संक्रमण के दौर से गुजर रही है। अपने कथ्य को सत्य, न्यायसंगत व तर्कसंगत साबित करने के लिए राजनीतिक पुरोधाओं व महापुरुषों पर छीटाकशी का सिलसिला न केवल चल निकला है अपितु परवान भी चढ रहा है।

यह क्षणिक राजनीतिक लाभ के लिए भले ही लाभप्रद हो, दीर्घकालिक राजनीतिक हितों के प्रति नुकसानदेह साबित होने वाला है। हालांकि इस राजनीतिक विद्वेष के लिए कोई एक दल अथवा व्यक्ति ही जिम्मेदार नहीं है, अपितु सियासी लाभ के लिए मौके कुमौके सभी दलों के अनेक राजनेताओं ने इसे हथियार बनाया है, परंतु सत्ता की सियासत के इस खेल में सर्वाधिक नुकसान लोकतांत्रिक प्रणाली,  राजनीतिक मूल्यों, आदशों व प्रतिमानों का हो रहा है।

जिम्मेदार सत्ता प्रतिष्ठान व संस्थाएं कमोवेश इस विषय पर खामोश ही दिखती रही हैं। इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था को आघात लगा है तथा राजनीति में अवसरवादिता बढी है। सियासत में नैतिकता की बातें, दबे शब्दों में ही सही, बेमानी सी कही जाने लगी हैं।

परिणाम यह हो रहा है कि राजनीति कलही और स्थापित मानदंडों के विपरीत ढर्रे पर चल निकली है। पर्दे के पीछे ही सही, अवसरवादिता को बुद्धिमत्ता का नाम देने की कोशिश हो रही है। यह सब जिम्मेदार सत्ता प्रतिष्ठानों की आंखों के सामने खुलेआम हो रहा है, पर इसे रोकने की ईमानदार कोशिश कहीं से भी आकार लेती नहीं दिख रही है।

विगत कुछ वर्षों से पंडित जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तित्व पर सवाल उठाये जाते रहे हैं। खासकर नेहरू गांधी परिवार को इसी बहाने घेरने की कोशिशें होती रही हैं। पर महत्वपूर्ण सवाल यह है कि राजनीतिक हित साधने के लिए ऐसे किसी राजनीतिक व्यक्तित्व पर सवाल उठाना कहां तक उचित है!

पंडित जवाहरलाल नेहरू का व्यक्तित्व बहुआयामी रहा है। सियासत से लेकर साहित्य, कला, विकास तथा अंतराष्टीय मुद्दों व सरोकारों पर उनकी राय रही है तथा उस राय का अपना महत्व भी रहा है। किसी भी व्यक्ति, उसके निर्णयों अथवा सरोकारों की मीमांसा उस कालखंड की परिस्थितियों, आवश्यकताओं तथा अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए की जा सकती है और उसी आलोक में इसे किया भी जाना चाहिए। परंतु ऐसा करते हुए भी भाषाई शालीनता और सियासी मर्यादाओं का ध्यान रखा जाना ही चाहिए।

पंडित नेहरू ने वैभवशाली जीवन त्यागते हुए स्वाधीनता संघर्ष में न केवल बढचढकर प्रतिभाग किया अपितु देश की आजादी को ही लक्ष्य बनाकर अनेक जेल यातनाएं सहीं। इतना ही नहीं आजाद भारत के विकास का जो सपना उन्होंने संजोया था, उसे भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। दो ध्रुवीय विश्वव्यवस्था के समानांतर विश्वफलक पर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना को पंडित नेहरू के अहम योगदान के रूप में आज भी देखा जाता है तो भारत चीन संबंधों के संदर्भ में उनके द्वारा प्रतिपादित पंचशील के सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं तथा अंतर्राष्टीय वार्ता के क्रम में आज भी उनका अपना महत्व है।

आजादी मिलने के बाद देश में संसाधनों के लगभग अकाल जैसे हालातों के बीच विकास को गति देने की उनकी कोशिशों भी को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। सामरिक व विदेशी मामलों में भी उनकी कोशिशों ने भारत को मजबूती दी, हालाकि इस बीच उन्हें चीनी विश्वासघात के फलस्वरूप युद्ध की विभीषिका से भी दो चार होना पडा। इसके जख्म आज भी हर भारतीय के मन में हरे ही हैं तथा हमें आज भी हमारी हजारों वर्ग किलोमीटर भूमि की दरकार की स्थिति जस की तस बनी हुई है।

इतना ही नहीं, पंडित नेहरू का सामान्य जीवन भी आम व खास दोनों ही तबकों के लिए प्रेरणाश्रोत रहा है। प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप बेहतर ही रहा है। बच्चों के प्रति उनकी संवेदना उनको अलग प्रतिष्ठित करती है। पीएम नेहरू का चाचा नेहरू में परिवर्तन इस बात की गवाही है। वह बच्चों को महानगरों के बजाय पर्वत, झरनों और हिमालय से रूबरू कराने की बात करते है।

स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से ऐ मेरे वतन के लोगों गीत सुनकर उनका भावविह्वल हो उठना उनके हृदय की कोमलता व जवानों के प्रति उनकी संवेदना का उदाहरण है। अटल के रूप में करिश्माई राजनेता की घोषणा करने वाले पंडित नेहरू कभी सियासी युगदृष्टा नजर आते हैं तो कभी डिस्कवरी आफ इंडिया के माध्यम से बच्चों व देशवासियों को देश की विरासत, संसाधनों व अन्य उपलब्धियों से परिचित कराने की कोशिशें उनके सतत विकासोन्मुखी चिंतन व प्रयासों का अप्रतिम उदाहरण नजर आती हैं।

इसके अलावा भी अनेक ऐसे तथ्य हैं जो राष्ट निर्माण में उनके योगदान को रेखांकित करते हैं। ऐसे में उनके व्यक्तित्व पर सवाल खडा करना न तो समीचीन है और न ही न्याय अथवा तर्कसंगत। देश के लिए नेहरू परिवार की कुर्बानियों को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता।

हालांकि इससे इतर दूसरा पक्ष भी है जिस पर चर्चा करना आवश्यक है। सियासत में मूल्यों का क्षरण व सिद्धांतों का अवमूल्यन भी एकाएक नहीं हुआ।

नब्बे के दशक में सियासी विरोधाभास को लेकर आरोपों प्रत्यारोपों का दौर जिस तरह से तेज हुआ उसने सियासत में अवमूल्यन की नई कहानी ही लिख डाली। बहस व तार्किक विरोध का स्थान व्यक्तिगत आक्षेपों ने ले लिया। मूल्यों और मुद्दों पर सियासत गौण हो गई और उसके स्थान पर आरोप प्रत्यारोप प्रमुख हो गये। कभी कभी तो परीक्षण में ये आरोप ही गलत साबित हुए लेकिन तब तक उससे होने वाली क्षति तो आकार ले ही चुकी थी।

सियासत में भाषाई आक्रामकता हर ओर से जारी रही। कभी मौत का सौदागर तो कभी खून की दलाली जैसे जुमलों का यह देश गवाह बना। कभी पप्पू तो कभी भारतीयता पर सवाल समेत अनेक जुमले उछाले गये। परंतु हासिल कुछ भी नहीं रहा, सिवाय इसके कि ऐसी गतिविधियों को लेकर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था व प्रतिमान दोनों ही शर्मसार हुए। सियासत में भ्रष्टाचार का जन्म भी कमोवेश कालखंड में हुआ। ऐसा करके लोकतंत्र के चेहरे को दागदार बनाने की कोशिश की गई। सार्वजनिक जीवन में शुचिता पर सवाल भी उठे। पर ये सवाल सवाल ही बना रहा कि आखिर इस मर्ज की दवा क्या है! हार्सटेडिंग ने व्यवस्था को सवालों के घेरे में ला दिया। सियासत इसे दुःस्वप्न की तरह भूलकर अपने रास्ते पर चलती रही। समरसता का स्थान सामाजिक विद्वेष ने ले लिया तो वोटबैंक की सियासत ने सामाजिक ढांचे को प्रभावित किया है। परिवर्तन की सदी के नाम से चर्चित 21वीं सदी ने अपने आरंभ में ही अनेक राजनीतिक परिवर्तन देखे हैं। बीते दो दशक में गैर कांग्रेसवाद का स्थान गैर भाजपावाद ने ले लिया है।

आज जिस पीढी के कंधों पर सियासत की जिम्मेवारी है, उनमें से अधिकांश पौध आजादी के बाद की है। जो पुराने लोग सियासत में हैं वे भी वय के  उत्तरार्द्ध में हैं। साथ ही उनमें से अधिकांश का सार्वजनिक जीवन भी समापन की ओर उन्मुख है। ऐसे में नयी सियासी पीढी की जिम्मेदारी है कि वह सियासत में शुचिता व स्थापित मानदंडों की पुनर्स्थापना की दिशा में काम करें। राजनीति का नेहरू कालखंड ऐसी सियासी गतिविधियों से इतर विकास व नवनिर्माण का समय व गवाह रहा है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी, डा मनमोहन सिंह व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस देश के विकास की अनूठी इबारत लिख रहे हैं। ऐसे में इन सियासी पुरोधाओं पर भाषाई आक्रामकता व संस्कारविहीन आचरण प्रदर्शित करने के बजाय उनके द्वारा स्थापित सकारात्मक सियासी मानदंडों व आदर्शों को अपनाने की आवश्यकता है तभी इस देश का समुचित विकास हो सकेगा। अमर्यादित सियासी आचरण व्यवस्था को कलही ही बनाएगा, अतः हर हाल में इससे बचना ही होगा।

(लेखिका मोनिका अग्रवाल राष्ट्रीय स्तर पर अख़बारों और पत्रिकाओं के लिए लिखती हैं )

नेहरू की तस्वीर साभार गूगल

 

 

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