बंद हों बंद ; लोग घृणा की दृष्टि से देखते हैं

बंद, जिसका प्रयोग महात्मा गांधी ने भारत की आजादी को पाने के लिए अहिंसा का एक सबसे बड़ा अस्त्र ब्रिटिश शासन के खिलाफ तैयार किया था, वह सिद्धांत आज अपने रस्ते से पूरी तरह से भटक चुका है.

यही कारण है कि किसी भी राजनीतिक दलों को अथवा जातीय समुदाय को भारत में बंद के दौरान आम जनता का समर्थन नहीं मिलता.

इससे सिर्फ देश की आर्थिक क्षति ही होती है.

तो “बंद को बंद” होना चाहिए. यही आज के दौर में हो रहे भारत बंद के खिलाफ आम नागरिक की सोच है.

दरअसल भारत में राजनीतिक दलों का आम जनता से कोई गहरा रिश्ता नहीं रहा है. राजनीतिक दल ऐसे रिश्ते एक दूसरे के खिलाफ अपनी बढ़त को बनाने के लिए बनाते और बिगाड़ते रहते हैं.

जहाँ तक जातीय समूहों द्वारा किये गए बंद का सवाल है वह राजनीतिक दलों के बंद से ज्यादे हिंसक और उदंड देखा गया है. यहाँ उनकी वे भावनाएं काम करती दिखाई देतीं हैं जो एक दूसरे के खिलाफ विद्वेष को लिये रहती हैं; तो ऐसे में उनके द्वारा कराये गए बंद का हिंसक हो जाना कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता.

तो, यहाँ गांधी का कोई सिधांत लागू नहीं होता; भले ही वे गांधी जी का दम कितना भी क्यों न भरें.

इन दिनों भारत बंद की बाढ़ सी आ गयी है. राजनीतिक दलों द्वारा आज जो सवाल खड़े किये गए हैं वे पूर्व में भी थे और उन दलों की सरकारों के दौरान भी थे जब उनके खिलाफ उस समय की विपक्षी पार्टियाँ ऐसे ही सवालों पर बंद बुला रही थीं.

हिसाब यहाँ आकर बराबर हो जाता है. यहाँ पर इसे भारत के आर्थिक ढांचे को कमजोर करने का उन सभी राजनीतिक दलों का मनमानापन ही कहा जा सकता है जो पूर्व में और वर्त्तमान में बंद का समर्थन करते रहे हैं या कर रहे हैं.

बंद के दौरान जो हिंसाएँ फैलाई जाती हैं उसकी क्षति का अंदाजा बंद को बुलाने वाले राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं को नहीं होता. कार्यकर्ता एक तोते की तरह रटे हुए काम करते हैं; जिनमें से अधिकांश नासमझ, उदंड और समाज तथा देश के प्रति गैरजिम्मेदार नागरिक ही दिखाई पड़ते हैं. जब हिंसा फैलती है तब यह बात पूरी तरह से सावित हो जाती है और राजनीतिक दल इसपर कोई दुःख भी प्रकट नही करते.

इस तरीके का कोई भी ऐसा बंद नहीं देखा गया जिसे आम जनता का समर्थन मिला हो. तो ऐसी स्थिति में राजनीतिक दलों को भी इस गफलत में नहीं रहना चाहिए कि आज या इससे पहले जो उन्होंने भारत बंद कराया उसका उन्हें 2019 के आम चुनाव में कोई फायदा होने वाला है. अब लोग बंद को घृणा की दृष्टि से देखते हैं.

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