शिबु के खिलाफ दुमका से लुईस को खड़ा करने की तैयारी

दुमका (झारखण्ड):

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की जो बैठक दिल्ली में चल रही है और वहां जो 2019 के आम चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल है उसमें झारखण्ड के दुमका लोक सभा सीट पर शिबु सोरेन के खिलाफ राज्य की कल्याण मंत्री लुईस मरांडी को मैदान में उतरने की बात भाजपा के गलियारों में उठी है.

फिलहाल लुईस मरांडी दुमका से विधायक हैं. शिबु सोरेन झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमो ही नहीं बल्कि आदिवासी जगत के दिशोम गुरु भी हैं.

2019 में मोदी सरकार को एक बार फिर से पॉवर में लाने के लिए भारतीय जनता पार्टी के ‘थिंक टैंक्स’ हिंदुत्व को और भी तेजी से उजागर कर तमाम बड़े विपक्षी नेताओं के खिलाफ अपने ऐसे उम्मीदवारों को मैदान में उतरना चाह रही है जो अगले पांच साल के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फिर से सत्ता में लाएं.

सूत्रों के अनुसार एक दिन पहले लुईस मरांडी ने केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी से मुलाक़ात की. उन्होंने एक ज्ञापन देते हुए संथाल परगना के विकास के बारे में बात की जिसमें देवघर-दुमका से रामपुरहाट (पश्चिम बंगाल)तक की सड़क को फोर-लेन बनाने की मांग है. जानकारी के मुताबिक इस मीटिंग में संथाल परगना के राजनीतिक हालत पर भी चर्चा हुई.

भारतीय जनता पार्टी के लिए, खासकर संथाल परगना में शिबु सोरने जैसे कद्दावर नेता को टक्कर देना एक बड़ी चुनौती रही है. पिछले विधान सभा चुनाव में लुईस मरांडी ने शिबु सोरेन के पुत्र हेमंत सोरेन को दुमका से पराजित कर दिया था.

भाजपा के सूत्रों के अनुसार, पार्टी को ऐसा लग रहा है कि यदि इस बार शिबु के खिलाफ लुईस को खडा कर दिया जाए तो बात बन सकती है.

हलाकि चुनावी राजनीति में लुईस का इतिहास बहुत लंबा नहीं रहा है. उन्होंने दुमका से दो बार चुनाव लड़ा, पहली बार 2009 में हार गई और 2014 के मोदी लहर में उन्हें सफलता मिली.

पार्टी ने लुईस मरांडी को संथाल परगना में चुनाव संबंधी दो बड़ी जिम्मेदारियां दीं थी- एक तो लिट्टीपाड़ा विधान सभा उप-चुनाव में मेनेजमेंट करना और दूसरा इसी साल हुए दुमका नगर परिषद् में अध्यक्ष पद के उम्मीदवार अमिता रक्षित को जिताने का. दोनों में वह बुरी तरह से असफल रहीं थीं. आपसी लड़ाई ने भाजपा के वोट को ही बर्बाद कर दिया.

भाजपा की राजनीति के जानकारों का कहना है कि दरअसल पार्टी के पास 2019 में दुमका लोकसभा से शिबु सोरेन के खिलाफ खड़े करने के लिए कोई ठोस उम्मीदवार नहीं है. पिछले दो चुनावों में भाजपा ने सुनील सोरेन को खडा किया और दोनों ही बार वे पराजित हुए. फ़िलहाल लुईस के दुमका विधानसभा जीतने के बाद सुनील सोरेन पार्टी में बहुत एक्टिव नही नजर आते. दुमका भाजपा में एक बड़ी समस्या गिरोहबंदी और भीतरी राजनीति का आपस में चलना बताया जाता है जिसमें लुईस के परिवार और उनके कथित समर्थक हमेशा पार्टी पर हावी होना चाहते है. पुराने लोगों ने दुमका में भाजपा की राजनीतिक बिजनेस से खुद को अलग कर रखा है.

इस बार का लोकसभा चुनाव दो बड़े एलायंस पर ही होगा. एनडीए और यूपीए का एक बड़ा धूर्वीकरण बनता जा रहा है, जिसमें जाति और धर्म की राजनीतिक परवान चढी है. जब आरएसएस प्रमुख ही हिन्दू वोट के बल पर देश को आगे ले जाने की बात करते हैं तो पूरा विपक्ष एक सूत्र में बंधता दिख रहा है. लुईस मरांडी इसाई समुदाय से आती हैं और झारखण्ड में भाजपा की सरकार और ईसाईयों के बीच भी कुछ तनातनी  दिख रही है. फिर आदिवासी मुद्दा भाजपा के लिए एक अलग समस्या बन चुकी है.

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