मॉल बड़ा कि हटिया

संथाल परगना (झारखण्ड):

मॉल बड़ा कि हटिया. इसपर एक लम्बी बहस हो सकती है.

भारत में तेजी से पनपे शहरीकरण के बावजूद यह आज भी गावों का देश बना हुआ है.

गाँव और शहरों के बीच एक माध्यम स्तर का भी शाहर आता है जिसे लोग कस्बा कहकर बुलाते हैं. रोजागर की दृष्टि से गाँव और मध्यम स्तर के शहर पीछे की ओर धकेल दिए गए है. लोग अपने बच्चों को बड़े शहरों की तरफ भेज रहे हैं.

यह जीवन का एक जटिल तरीका है. इसके पीछे पूरा परिवार और खासकर उसका मुखिया परेशान है.

शहरों में बढ़ी भीड़ ने मॉल को खोला. पहले तो भारत की कम्पनियाँ इस दिशा में आयीं, फिर अमेज़न और फिल्फ्कार्ट जैसी अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड भी इस तम्बू में घुसी. इनका दवा है कि यहाँ सबकुछ बिकता है.

फिर भी ये कम्पनियाँ अभी तक ग्रामीण हाट या हटिया को पछाड़ नहीं पायी है. झारखण्ड के ग्रामीण इलाके में आज भी इसका बोलबाला है. यहाँ तक कि इससे सटे शहरों और कस्बों के बाजार आज भी ऐसी ही हाट पर निर्भर हैं-कम से कम सप्ताह में दो दिन.

संथाल परगना में छह जिले हैं-दुमका, गोड्डा, पाकुड़, साहेबगंज, जामताड़ा और देवघर. इन जिलों के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में जम कर हटिया लगती है. एक बड़ा अर्थतंत्र है. अपने उपजाए गए अनाजों, पाले गए पशुओं और पक्षियों, हाथों से बनाये गए औजारों और खेती की वस्तुओं के साथ-साथ चूहे मरने की दवा, खाज-खुजली के मलहम, आँखों के सूरमा, औरतों से श्रृंगार के साधन, गायों –बकरियों को बंधने के लिए रस्सियाँ, घर बनाने के लिये बांस, खाने पीने की वस्तुएं, नशे करने के लिए देसी दारू, खैनी और बागबानी के लिए पौधे और उनके बीज सभी चीजें इन हटियों में मिलती हैं.

“हमलोगों ने माल के कल्चर को देखा है, पर जितना फ्रेश सब्जी और जितनी जरूरतों की वस्तुएं हाट में मिलती है उतनी कहीं नहीं,” एक ग्रामीण ने बताय.

सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसे हाट पारिवारिक मेल जोल के लिए भी जगह हैं. लोग जिनके घर जाकर नहीं मिल पाते वे ऐसे हटिये में मिल जाते हैं.

“ राजनीतिक दल भी इससे लाभ उठाते हैं. वे अपना कार्यकर्म हटिया के दिन इसलिए रखते हैं कि लोगों की भीड़ उन्हें बिना बुलाए मिल जाती है और वे ग्रामीण लोगों में अपनी बात आसानी से पहुचा देते हैं. यह माल में संभव नहीं है,” झारखण्ड विकास मोर्चा के दुमका स्थित केंद्रीय कार्यकर्ता पिंटू अग्रवाल ने जानकरी दी.

भारत की एक बड़ी अर्थ व्यवस्ता ऐसी ही हटियों पर टिकी हुई है. पर सरकार का ध्यान इनपर कभी नहीं जाता. यहाँ जो हजारों लोग आते हैं उनके लिए पानी, शौचालय और साफ़ सफाई का कोई प्रबंध नही है.

दरअसल इस अर्थतंत्र को मारने की काफी कोशिश की गयी. पर यह जमीन से इस तरह से जुडी है कि इसकी हस्ती मिटाई नहीं जा सकती. यह एक सभ्यता है, अपनी खास संस्कृति के कारण हजारों सालों से ऐसे ही चली आ रही है. यह माल से सस्ती है और ताजा भी.

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