संथाल परगना इतना खूबसूरत क्यों है

संथाल परगना (झारखण्ड):
यह भव्य नहीं है, यह अद्भुत भी नहीं है –लेकिन इसकी खूबसूरती अपने आप में बेमिशाल है.
यह संथाल परगना है. झारखण्ड के पूर्वी छोर पर बसा एक इलाका जिसका इतिहास धरती के काल खंड के साथ ही चलता आया है. यहाँ जो भी आया मोहित हो गया.
चारो और बंजर पठारों से धिरा छह जिले वाला यह इलाका जिसका मुख्यालय दुमका है अपनी बेपनाह खूबसूरती को लिये हुए है, फिर भी यह पर्यटकों के अछूता ही रहा है.
भू-विज्ञान के जानकार अंग्रेजों ने इस इलाके का एक पर्शियन नाम रखा था –दामिन –ई-कोह, जिसका अंग्रेजी अर्थ था “स्कर्ट ऑफ़ द हिल्स” यानि वह पहाडी श्रृंखला जो किसी युवती के स्कर्ट की भांति दिखे.

यहाँ एक राजमहल की पहाडी श्रृंखला है जो धरती के बनने के काल से खडी है और इसकी तुलना दक्षिण अफ्रिका के उन कुछ गिने चुने पहाड़ियों से ही की जा सकती है जो धरती के बनने के समय ज्वालामुखी के विष्फोटों से बनी थी.
राजमहल की पहाडी श्रृंखलाओं को भारत के पुरातत्व विभाग और मानव विज्ञान के जानकारों द्वारा सराहा गया है, इसलिए कि यह मानव जीवन की उत्पत्ति के जीवाश्म अपने सीने में समेटे हुए है.
राजमहल की पहाडी श्रृंखलाएं अपने नाम के अनुसार ही खूबसूरत दिखती है. इसपर सिकंदर के ज़माने का यात्री मेगास्थनीज से लेकर अंग्रेज जमाने के बुकानान तक ने काम किया, और ऐसा लगता है कि अभी और भी काम होना बाकी है.
झारखण्ड का यह सौभाग्य है कि इसके इसी पूर्वी इलाके में गंगा बहती है जो बिहार और बंगाल को आपस में जोडती है. झारखण्ड में और कहीं गंगा नहीं है. यह हिलसा मछलियों का खान है.
इन पहाड़ों के नीचे भारत की एक सबसे आदिम जन-जाति का निवास स्थान है जिसे पहाड़िया के नाम से बुलाया जाता है और जो मेगास्थनीज के ज़माने से हैं, मतलब सिकंदर के ज़माने से.
इस इलाके के आगे जब आप दामिन-ई-कोह के असली इलाके में आते हैं तो लिट्टीपाड़ा और बरहेट का वह इलाका आता है जो चारों ओर पहाड़ियों से घिरा एक ऐसा गोलाकार बनाता है जो समतल जमीन को अपने स्कर्ट में समेटे हुए प्रतीत होता है. यहाँ पर खूबसूरती बेमिशाल है. पहाड़ियां छोटी हैं, पर लोगों की आँखें खुली रख देती हैं.

आगे बढ़ें तो मसानजोर का इलाका जहाँ जल का एक भण्डार और एक विशाल डैम है जिसे प्रथम पंचवर्षीय योजना के तहत मात 62 लाख रूपये में बी बनाया गया था, मन को मोह लेता है. देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद में इसकी आधारशिला राखी थी. इसने बंगाल को आकाल से बचाया. यहाँ का मीठा पानी और पहाडी दुमका के मसलिया और आसपास के इलाके को इस प्रकार घेरता है जिसे लोग देखते ही रह जाते हैं.
यहाँ एक खूबसूरत नाम बाली नदी बहती है जिसे मयूराक्षी कहते हैं जिसका उद्गम माहदेव की भूमि देवघर के श्रृष्टि पहाड़ को बताया जाता है.
और आगे बढिए जामताड़ा, दुमका और मधुपुर के इलाके और वापस लौटिये गोड्डा की ओर तो सैकड़ों ऐसे छोटे पहाड़ मिलेंगे हो कुछ ही दूरी पर ख़त्म हो जाते हैं. इन पहाड़ों की उंचाई तो अधिक नहीं है, पर ऐसा प्रतीत होता है कि इसे ईश्वर ने ला कर किसी ख़ास जगह पर बिठा दिया है.

गोड्डा और राजमहल की इन पहाड़ियों के अन्दर विशाल कोयले का भंडार है हो सैकड़ों सालों तक भारत की जरूरतों को पूरी करने की क्षमता रखती है.
लेकिन संथाल परगना की कोई भी नदी घातक नहीं है, वह उर्वरा भी नहीं बनाती है उन भूमि को जिसपर खेती की जा सके. यहाँ की नदियों में मयूराक्षी, बास्लोयी, अजय, कझीया और भुरभूरी काफी महत्वपूर्ण है, जो सिर्फ बरसात में अपना काम दिखती है, बाकी के दिन सूखी ही रहती है.
सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि संथाल परगना में मात्र 10 प्रतिशत ही जंगल बचे हैं, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 30 प्रतिशत है. कभी यहाँ जंगल भी हुआ करते थे. जब संथाल लोगों ने इसे आपना घर बनाया तो यह इलाका जंगलों से भरा था. उन्होंने इसे साफ़ किया और अपने रहने लायक बनाया. तब संथाल परगना काफी खूबसूरत था, अब यह उतना वर्जिन नहीं है.

फिर भी संथाल परगना की खूबसूरती बेमिशाल है. यहाँ पर्यटन स्थल है, पर कोई सुविधा नहीं होने के कारण यह वीरान ही पडा रहता है. इसपर अभी बाहरी लोगों की नजर लगनी शुरू ही हुई है, आगे कई समस्याएँ पैदा कर सकती हैं.

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