दादा के बारे में मीडिया के सारे आकलन गलत निकले

भारतीय मीडिया जो पिछले एक सप्ताह से चीख रहा था कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति और कांग्रेस के एक सबसे बड़े नेता प्रणब मुखर्जी नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुख्यालय में क्या-क्या बोल सकते हैं, सबों के अनुमान गलत सवित हुए.
संघ शिक्षा वर्ग के दीक्षांत समारोह में अपना भाषण देने गए मुखर्जी के बारे में भारतीय मीडिया का जो राजनीतिक आकलन था वह इतना गलत सवित हुआ कि उसपर अब भरोसा करना मुश्किल लगता है.
दरअसल दिल्ली के पत्रकारों की आदत है कि वे हर चीज को राजनीतिक बना कर अपनी पीठ ठोंकते हैं, वे इस बार भी इससे बाज नहीं आये और यह भूल गए कि प्रणब मुखर्जी अपने आप में एक राजनीतिक संस्थान हैं जो मीडिया के हिसाब से नहीं, बल्कि अपनी आत्मा के हिसाब से चलते हैं.
दरअसल दिल्ली की मीडिया यह चाहती थी कि प्रणब मुखर्जी कांग्रेस, सोनिया गांधी या फिर राहुल गांधी –या नहीं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में कुछ बोल दें ताकि उनका अगले एक सप्ताह का दाना –पानी चल सके. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और वे धडाम से गिरे.
पूर्व राष्ट्रपति ने अपने अंग्रेजी में दिए भाषण में राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति की बात की और इसी सन्दर्भ में उन्होंने भारत का इतिहास दोहराया जो इतिहास पढने वाला एक स्कूल का छात्र भी अच्छी तरह से जानता है.
यह एक प्रकार से राष्ट्र के नाम सन्देश था जिसे उन्होंने आर एस एस के मंच से दिया. एकदम सामान्य सी बातें थीं जिसमें भारत के गौरव से लेकर उसकी कठिनाइयाँ और अनेकता में एकता की बात कही गयी थी.
उन्होंने भारत के बारे में फाहियान और व्हेनसांग ने क्या –क्या कहा था उसे बताया और अपने प्राचीन संस्कृति के धरोहर नालंदा, विक्रमशिला और तक्षशिला विश्वविद्यालयों की चर्चा की.
उनके सन्देश का मूल यही था कि भारत हर संकट में एक होकर खडा रहा है और भारत के लोग एक हैं.

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