हिन्दी साहित्य में एक नया प्रयोग: शिमला की डायरी

बिहार के भागलपुर शहर और भारत के एकदम उत्तर-पूर्व में बसे अरुणाचल प्रदेश में अपना जीवन जीने वाले डॉ राजेश वर्मा की पुस्तक “शिमला की डयरी” उपन्यासों, कहानियों, कविताओं और जीवन से जुडी इधर –उधर की बातों का एक ऐसा संग्रह है जो हिंदी साहित्य में बहुत ही कम दिखाई पड़ता है और शायद हिंदी का कोई लेखक इस तरीके से लिखने की हिम्मत भी न जुटा पाए.
यह एक प्रयोग है.
यदि आधुनिक रूप में देखें तो “शिमला की डायरी” दरअसल एक साहित्यिक “माल” की तरह है जहाँ पर आपको हर चीज एक ही स्थान पर मिल जायेगी, भटकने की जरूरत नही हैं.
लेखक डॉ वर्मा इतिहास के एक जाने माने जानकर हैं जो अरुणाचल प्रदेश के एक गवर्नमेंट कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं और जो मूलतः नार्थ ईस्ट के इतिहास पर किताबें लिखा करते हैं. इनकी किताबें विश्व स्तर पर स्वीकार की गयी हैं. उन किताबों को उन्हेंने दरअसल अंगरेजी में लिखा. हिंदी में लेखक का यह पहला संग्रह है.
एक लेखक के जीवन में होता क्या है? कभी –कभी वह अपने मूल विषय वास्तु से हटकर स्वान्तः सुखाय के लिए कुछ –कुछ लिखना शुरू कर देता है और एक दिन उसे पता चलता है कि कागज के पन्नों पर उसकी लिखी गयी सामग्री अब एक किताब का रूप लेने लायक हो चुकी है.
“शिमला की डयरी” भी मूलतः यही है. लेखक चूँकि बिहार के भागलपुर शहर के रहने वाले हैं तो उनकी बातों में बिहारीपन तो है ही साथ ही इतने लम्बे समय से अरुणाचल में रहने का जो लाभ उन्हें मिला उसको भी उन्होंने कुछ पन्नों में समेट दिया.
तो यह एक समिश्रण हैं –जिसे शिमला की डयरी का नाम दिया गया. इस किताब में इंसान के मनोविज्ञान से जुड़े दो लघु उपन्यास हैं और फिर शुरू होती हैं उन कहानियों का सिलसिला जो बेजोड़ तरीके से लिखी गयी हैं.
यदि आपका मन दो लधु उपन्यासों – “वैरी मन का मायाजाल” और “शिमला की डयरी” से मन न भरे तो आप लघु कथाओं की और रूख कीजिये और यकीन मानिये कि बिज्जी, भूत, जलेबियाँ, अलविदा देव और अतिथि आपका मन मोह लेंगीं.
इस किताब को प्रथम पेज से पढने की जरूरत नही है. आप कहीं से भी शुरू कीजिये-मन लगेगा और ऐसा लगेगा कि क्या ऐसा जीवन में होता भी है. आप यदि कविताओं के शौकीन हैं तो हाजिर है- वन्दना, तेरी शरण में, राम नाम महिमा और जीवन में इधर उधर की बातें तो होती ही रहती हैं, तो शुरू हो जाइए पढने के लिए दोस्ती-दुश्मनी, एक मुलाकात, अच्छा नहीं लगता और पुलकित मन को जानने के लिए.
यह किताब नोशन प्रेस, मद्रास से प्रकाशित हुई है. इसकी कीमत मात्र 250 रुपया है जो आपको नोशन प्रेस के अलावा अमेज़न और फिलफ्कार्ट पर भी मिल जायेगी.

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