सत्ता खोने के 100 बहाने (पार्ट-7)

भारतीय जनता पार्टी के साथ जो राजनीतिक पार्टियाँ ढाई –ढाई साल के फार्मूले पर सत्ता चलने का प्रयास करती रही हैं उनका राजनीतिक अनुभव कुछ अच्छा नहीं रहा है. सन 2009 से 2014 के बीच झारखण्ड में भी कुछ ऐसा ही हुआ.
झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के युवा नेता और पार्टी सुप्रीमो शिबु सोरेन के पुत्र हेमंत सोरेन का इस मामले में बड़ा ही कटु अनुभव रहा है.
दूसरी और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा अपने इलाके में एक विशाल ताकत लिए रहने के बावजूद हमेशा किसी दल से समर्थन लेकर या फिर दे कर सरकार में रही. बिहार के ज़माने में एक बार उन्होंने राबडी देवी की सरकार को अपना समर्थन देकर बचाए रखा.
जेएमएम का मूल उदेश्य झारखण्ड तक ही सीमित रहा है जिसमें उसका जो राजनीतिक तालमेल है वह –“मियां, मांझी और महतो” कहलाता है. जेएमएम ने हमेशा मुस्लिम, आदिवासी और महतो समाज को अपने केंद्र में रख खर राजनीति की, जो शिबु सोरेन के ज़माने से पहले ही बना दिया गया था.
हेमंत सोरेन एक युवा नेता थे और पहली बार 2005 में दुमका से विधान सभा चुनाव लडे और उस स्टीफन मरांडी से हार गए जो जेएमएम के एक सबसे पुराने नेता थे और जिन्हें गुरूजी (शिबु सोरेन ) ने हेमंत की जिद पर दुमका से टिकट नहीं दिया जबकि स्टीफन पिछले 30 साल से दुमका से जीतते चले आ रहे थे.
लेकिन 2009 की राजनीति काफी बदली हुई थे. केद्र में एक बार फिर से यूपीए सरकार आ गयी थी. इसी समय झारखण्ड विधान सभा का जब चुनाव हुआ तो समीकरण यह बना कि जेएमएम और भाजपा दोनों मिलकर सरकार बना ले. हेमंत ने इस बार स्टीफन को दुमका से हरा दिया था जो कांग्रेस में चले गए थे.
अब भाजपा और जेएमएम की एक बेमेल दोस्ती हुई. मुख्यमंत्री भाजपा के अर्जुन मुंडा बने और हेमंत पहली बार उप-मुख्यमंत्री बनाये गए. हलाकि इस बीच जून 2009 में वे कुछ समय के लिए राज्य सभा के सांसद भी हो गए थे.
झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को सबसे बड़ा सदमा यह लगा था कि 2009 के लोक सभा चुनाव के बाद शिबु सोरेन के बड़े पुत्र दुर्गा सोरेन, जो पार्टी की मजबूती से सँभालते थे, का अचानक निधन हो गया.
हेमंत तो मौका मिला और 2 फरवरी की जेएमएम की वार्षिक मीटिंग जो हर साल दुमका में होती है उसमें शिबु ने हेमंत को अपना राजनीतिक वारिस घोषित कर दिया.
शिबु तीन बार मुख्यमंत्री बनकर भी सरकार को नहीं चला पाए थे. तो कहा यह जाता है कि भाजपा ने हेमंत से ढाई –ढाई साल का समझौता किया सरकार चलने का. पहला मौका भाजपा को मिला और जब जेएमएम की बारी आयी तो भाजपा के लोग इस बात से मुकर गए कि कही भी ऐसा कोई लिखित समझौता नहीं हुआ है. भाजपा ने उत्तर प्रदेश में महावती के साथ भी यही किया था. तब हेमंत ने झारखण्ड में भाजपा की सारकार गिरा दी. अब थोड़े समय के लिए राष्ट्रपति शासन लग गया.
इस बीच सत्ता का जो जोड़ तोड़ हेमंत ने किया यह उनकी दिमागी ताकत का ही नतीजा था कि जुलाई 2013 में उन्होंने कांग्रेस और राजद के साथ मिलाकर सरकार बना ली और पहली बार मुख्यमंत्री बन गए.
हेमंत ने एक सबसे बड़ा काम और किया. जो कुछ बड़े नेता जेएमएम से किसी कारण बाहर चले गए थे, खसकर स्टीफन मरांडी और अनिल मुर्मू उन्हें फिर से पार्टी में लाया.
उम्मीद यह की जा रही थी कि 2014 में वे मजबूती से उभरेंगे. पर इस बार देश मोदी लहर में डूबा था जिसका असर झारखण्ड पर भी पडा. फिर भी जेएमएम एक मजबूत विपक्ष के रूप में उभरा.
बताया जाता है कि हेमंत के साथ भी वही समस्या है जो शिबु सोरेन के साथ रही. उनके पास भी सटीक सलाहकारों की कमी है और राजनीतिक की आधुनिक दुनिया से वे काफी दूर हैं और आज भी वही पुराने रिवाज –“मियां, मांझी और महतो” पर भरोसा करते है, जो शायद 2019 में उन्हें कुछ इसमें बदलाव करना पड़े.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *