सत्ता खोने के 100 बहाने (पार्ट-4)

सत्ता खोने के 100 बहानों में जो सबसे ज्यादा विवादों में है वह वाम दल में महान नेता और बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय ज्योति बसु का जीवन संघर्ष है.
आप क्या सोचते है, वाम दलों में हमेशा एकता रहती है, नहीं. राजनीति में एकता का डीएनए खोज पाना मानव इतिहास की सबसे संघर्ष की घड़ी रही है.
एक वरिष्ठ पत्रकार अरुण शौरी जो बाद में नेता भी बने ने वाम दलों पर 80 के दशक में यह लिखकर कि इन दलों की भारत की आजादी में नाकरात्मत भूमिका रही थी, रातों रात चर्चित हो गए थे.
अरुण शौरी ने यह खोजकर कोई बड़ा काम नही किया था.
आप जब एन एन मित्रा द्वारा संपादित “दि इंडियन एनुयल रजिस्टर” के कई खण्डों को पढेंगें तो आपको पता चलेगा कि ब्रिटिश भारत में राजनीतिक दलों और उनके नेता क्या –क्या कर रहे थे. यह दरअसल ब्रिटिश सरकार द्वारा की गयी एक सर्वे रिपोर्ट है, जो हरे रंग की जिल्द से बंधी और खूब छोटे अंग्रेजी के शब्दों में लिखी गयी हैं. अरुण शौरी ने वक़्त का इस्तेमाल किया और रातों रात भारत में वाम दल चर्चा में आ गयी.
आब आते हैं ज्योति बसु पर. यह अकाट्य सत्य है कि आजादी के बाद उनके टक्कर का वाम दल का नेता नहीं हुआ. उन्होंने बंगाल को तीन दशकों तक संभाला.
किन्तु समय का फेर यह था कि 1996 में जब देश में संयुक्त मोर्चे की सरकार में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने का ऑफर दिया गया तो उन्होंने इसे ठुकरा दिया.
कहते हैं कि माकपा की केंद्रीय कमिटी के कुछ वरिष्ठ सदस्य एक मीटिंग में यह फैसला कर के पहले से आये थे कि ज्योति बसु को प्रधानमंत्री नहीं बनने देना है. पार्टी में विरोध हुआ और ज्योति बाबू ने अपने पैर खीच लिए. बाद में उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री पद पर रहकर हो सकता था कि वे देश को एक नई दिशा दे सकते थे.
पर इतिहास में अगर –मगर, किन्तु –परन्तु नहीं होता. यह उनके जीवन की भूल भी जो सत्ता खोने के 100 बहाने के अन्दर “बॉर्डर न्यूज़” द्वारा रखा जा रहा है.
इतना तो तय था कि उनके एकबार प्रधानमंत्री बन जाने के बाद देश कई प्रकार की बर्बादी के रस्ते पर जाने से बच सकता था!

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