मीनाक्षी की “बस तुम्हारे लिये” साहित्य के प्रति समर्पण है

यह जो वाक्य है “बस तुम्हारे लिये” इसमें समर्पण का भाव है. समर्पण किसी व्यक्ति के प्रति किसी व्यक्ति का हो सकता है, और इंसान जब मानसिक रूप से और भी तरक्की कर लेता है तो उसका समर्पण साहित्य की ओर मुड़ जाता है. फिर जब शब्दों का निर्माण शुरू होता है तो सीमायें अनंत की ओर चली जाती हैं.
राजनीति विज्ञान की पढाई से अपने व्यक्तित्व को तैयार करने के बाद मीनाक्षी सिंह ने कुछ ऐसे शब्दों को गढ़ना शुरू किया जिसका राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं था. यहाँ राजनीती से मतलब उस राजनीति से नहीं जिसकी चपेट में आजका भारत है, मैं उस राजनीति की बात कर रहा हूँ जिस ज्ञान के लिए दार्शनिक माने जाते हैं लोग.
लोग वर्षों मेहनत कर भी दो शब्दों के नीच एक सा ताल-मेल नहीं बिठा पाते, यहाँ तो “बस तुम्हारे लिये” में 120 पृष्ठों की एक काब्य संग्रह की बात है जिनमें पांच खण्डों में कुल 68 एक से बढ़कर एक कवितायेँ लिखी गयी हैं.
मीनाक्षी कहती हैं कि यह उनका प्रथम काव्य संग्रह है—तो क्या हुआ? प्रथम ही तो सबसे महत्वपूर्ण है. यह वह दरवाजा है जिसे यदि आपने पार कर लिया तो आगे सारा संसार आपके सामने खड़ा है.
शुरुआत होती है “मुझे तुमसे प्यार है” से. कोई भी इंसान इस शब्द को सुनने के लिए सारी जिन्दगी तरसता रह सकता है और जब कोई इसे कविता में ढाल कर कहे तो उसकी प्रतिक्रया क्या हो सकती है –यह मैं नहीं कहूँगा आपको इसके लिए मीनाक्षी की कुछ पंक्तियाँ पढनी होगी. यकीन मानिए मनोभाव की कुछ नई जानकारी ही यहाँ मिलेगी.

कवित्री ने अपने राजनीतिक ज्ञान को भी कविता में ढाल दिया, जिसके लिए वह लिखती हैं –“एक थे हम, एक हमारी जुवां, फिर दिलों में ये फर्क कैसे आ गए.” इन शानदार पंक्तियों की आगे की जानकारी के लिए आप “हुक्मरानों की साजिशे” पढ़ें.
किसी व्यक्ति का परिचय इस बात से नहीं होता कि वह कहाँ का रहने वाला है-साहित्यकार का तो खासकरके नहीं. जब वह साहित्य की रचाना करता है तो वह हर जगह के लिए हो जाता है. कविता संग्रह में मीनाक्षी सिंह के बारे में लिखा है कि वह बिहार के मुझफ्फरपुर की हैं. फिर भी मेरा मन नहीं करता कि इस बात पर फोकास करूँ. हिंदी पट्टी के लोग उन्हें एक कवित्री के रूप में जाने और वो इसके लिये ही जानी जाएँ यही कामना है.
इस कविता संग्रह को इलाहबाद के अंजुमन प्रकाशन ने प्रकाशित किया है और इसका मूल्य मात्र 120 रुपया है तो इसे पाठकों के लिए खरीदना भी मुश्किल नहीं होगा.
मीनाक्षी सिंह कवित्री से पहले एक स्त्री हैं तो जाहिर है कि माँ के प्रति उनका आदर सबसे अधिक होगा. तभी तो वह “बोलो न माँ” और “एक माँ” जैसी कविता की भी रचना करती हैं.
आजका इंसान फेसबुक से इतना अधिक जुड़ गया कि पता ही नहीं चलता कि यह सम्बन्ध आखिरकार कैसे बन गया. फेसबुक ने सबका “डीएनए” एक जैसा कर दिया.
फिर होता यह है कि इसपर भी मीनाक्षी की कलम बोलती है-“फेसबुक लव” पर.
वह स्थिर नहीं है. विषय एक नहीं है. मन शायद चंचल है. एक स्थान से दूसरे स्थान पर चली जाती हैं. सही तो है. इंसान जबसे इंसान बना चला ही तो जा रहा है.

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