महिला दिवस पर झारखण्ड में जागरूक नारियों का सिंथेटिक अभियान !

रांची: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर बिडम्बना यह कि एक और जहाँ बिहार की महिलाओं की पुकार पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पूरे राज्य में शराबबंदी कठोरता से लागू कर दी, वहीं झारखण्ड में ग्रामीण महिलाएं ही शराब बेचती दिखती हैं.
“यह एक शुद्ध राजनीति है. हम महिलाओं ने हजार बार झारखण्ड के मुख्यमंत्रियों से आग्रह किया कि शराब से छुटकारा दिलाइये, किन्तु अब तो सरकार ने ही शराब बेचने का फैसला कर लिया है. हमारे विरोध को तो नशे में ही डुबो दिया गया,” दुमका की एक सामजिक कार्यकर्त्ता बिटिया मुर्मू कहती हैं.
बिहार में शराब बंदी के बाद से अशांति दूर हो गयी है, पीने वाले लोग अपने घरों में मदद करने लगे हैं, ऐसा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं. इसके उलट भारतीय जनता पार्टी की रघुबर सरकार ने तो अगले अगस्त के अपना खुद का शराब का दूकान खोलने जा रही है.
झारखण्ड में महिलाओं की आबाज नहीं सुनी जाती. आज अंतर्राष्ट्रीय दिवस पर पूरे राज्य में महिलाओं का जो उफान दिख रहा है वह बहुत हद तक सिंथेटिक है.
पिछले कई सालों से झारखण्ड के ग्रामीण इलाकों में, खासकर आदिवासी इलाकों में महिलाओं की जो जागरूकता दिखाई पड़ रही है उसमें उन्होंने शराब के विरोध में आन्दोलन तो खडा किया पर उन्हें उन जागरूक महिलाओं का जोरदार समर्थन नहीं मिला जो आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विभिन्न मंचों को सुशोभित कर रही हैं.

झारखण्ड में इस चलन का लाभ किसी को नहीं हो रहा-ना पीने वालों को और ना ही पिलाने वालों को. जो महिलाएं हड़िया-दारू के व्यापार में लिप्त हैं वो उन्हें विरासत में मिली हैं. कुछ को तो शराब की लत भी है. जहाँ देखिये, सड़कों के किनारे, खेतों में, हाट बाजार में और किसी वीराने रास्तों पर वे चावल और महुए से बनी शराब ले कर ग्राहकों का इंतज़ार करती रहती हैं.
जानकारों का मानना है कि यह सब सामजिक जागरूकता से ख़त्म होगा.
सवाल यह है कि क्या जागरूक लोग शराब नहीं पीते. यह व्यापार (इसे धंधा काहना चाहिए) आदिवासियों की जड़ों को हिला चुका है. “मृत्यु कई रास्तों को चुनती है, इनमें से शराब भी एक है जो अकाल मृत्यु लाती है. लोग 60 का बसंत नहीं देख पाते. युवाओं में जो लत पडी है उससे वे झगडालू होते जा रहे है. इसका तो अंत होना जरूरी है,वरना ये खुद अपना अंत कर लेंगे,” आदिवासी समाज के जानकारों का ऐसा मानना है.

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