जेएमएम ने भाजपा के साथ मिलकर आदिवासियों को तवाह किया: बाबूलाल मरांडी

रांची: झारखण्ड विकास मोर्चा सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी का दावा है कि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा जो खुद को आदिवासियों का रहनुमा मानती रही है आजके दिन उसने आदिवासियों को बीच मझधार में छोड़ दिया है.
झारखण्ड मुक्ति मोर्चा अपने मुद्दों को दरकिनार कर भारतीय जनता पार्टी की पूंजीवादी नीति के ही पीछे चल रही है. खासकर संताल परगना के आदिवासी और पिछड़े हुए लोग जिनकी जमीन सरकार ने उद्योगपतियों को दी उनके लिए झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने कभी कुछ नहीं किया बल्कि उनका शोषण एक वोट बैंक में करती आ रही है.
झारखण्ड मुक्ति मोर्चा पर झारखण्ड विकास मोर्चा सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी का यह सीधा राजनीतिक हमला है जिसके लिए उन्होंने पाकुड़ जिले के अमडापाडा और लिट्टीपाडा इलाके का उदहारण पेश किया है जहाँ जेएमएम ने वर्षों राज किया और उन आदिवासियों को अपना वोट बैंक बनाकर रखा और उनको समाज की मुख्य धरा में कभी नहीं लाया.
मरांडी में “बॉर्डर न्यूज़” को दिए अपने एक साक्षात्कार में बताया कि सरकार जिनकी जमीन लेती है उनके साथ दरअसल अंत में क्या होता है.
पैसे पूंजीपतियों की मर्जी के हिसाब से तय किये जाते है. कुछ वर्षों बाद आदिवासियों के जमीन के लिए दिए गए पैसे ख़त्म हो जाते हैं. वो पैसों को संभाल कर नहीं रख पते और परिणाम यह होता है कि जो कभी जमीन के मालिक हुआ करते थे वे बेघर हो मजदूरी करते हैं.
प्रश्न: आप जेएमएम को इसके लिए क्यों जिम्मेदार ठहराते है, जबकि मोर्चा ने झारखण्ड के लिए लड़ाई लड़ी ?
उत्तर: यह सच है कि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने अलग राज्य के लिए लड़ाई लड़ी. इस लड़ाई में आदिवासियों ने उन्हें समर्थन दिया. वे उनकी ताकत बने. किन्तु यह भी सच है कि झारखण्ड अलग राज्य बनने के बाद झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने उन आदिवासियों के लिए कुछ नहीं किया. जमीन आदिवासियों ने दी, पर जेएमएम ने सिर्फ उनकी बर्बादी का तमाशा देखा.
प्रश्न: तो आदिवासियों को अपने हक़ की लड़ाई के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर: हमारी पार्टी झारखण्ड विकास मोर्चा ने अभी हक़ और माटी की लड़ाई शुरू की है. मैं यह देख रहा हूँ कि आदिवासियों के एक बड़े समूह हमारी और उम्मीद से देख रहे हैं. भजपा ने उन्होंने तो पूरी तरह से बर्बाद करने को ठान ली है. यदि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा आदिवासियों के प्रति अपनी ऑंखें मूँद लेती है तो उन्हें तवाह होने के लिए छोड़ तो नही दिया जा सकता.
प्रश्न: लेकिन आप तो मूल रूप से भाजपा के नेता थे.

उत्तर: इससे इनकार नही करता किन्तु मैं भाजपा को क्यों छोड़ा वह कोई नहीं पूछता. दरअसल भारतीय जनता पार्टी सिर्फ वैसे भी मुद्दे खड़े करती है जो कभी पूरी की ही जा ना सके, जैसे –राम मंदिर, मुसलमानों के प्रति लोगों में खौफ पैदा करना और अन्य धार्मिक मुद्दे जिससे लोगों का मानसिक शोषण किया जा सके. मैंने जब सुधारवादी नीति अपनाई तो पार्टी के लोगों के लिए मैं खटकने लगा. आज झारखण्ड में विकास की जो भी बातें हो रही हैं उसकी एक मुख्यमंत्री के रूप में आधारशिला मैंने ही रखी थे. संताल परगना में रेल, दुमका को उप-राजधानी, स्टेट हाईवे का निर्माण, ग्रेटर रांची की कल्पना, गंगा पर पुल, दुमका में हाई कोर्ट बेंच की स्थापना और दबे –कुचले लोगों को एक बेहतर जिन्दगी देने की लड़ाई तो मैंने ही शुरू की थी.
प्रश्न: आपके हिसाब से जमीन देने वालों के लिए सरकार को क्या करना चाहिए?
उत्तर: मैंने यह कभी नहीं कहा कि विकास के लिए लोग जमीन ना दें. मेरा सवाल यह है कि जमीन के बदले सरकार विस्थापितों को जमीन दे.
प्रश्न: सरकार कैसे जमीन देगी?

उत्तर: अभी जो सरकार के लैंड बैंक की रिपोर्ट आयी है उसमे झारखण्ड सरकार यह दावा करती है कि उसके पास 21 लाख एकड़ जमीन जमा हो गयी है. अब सरकार किसी से दे दो-चार एकड़ जमीन लेती है तो उसे वह अपने लैंड बैंक से जमीन के बदले जमीन विस्थापितों को दे.
बाबूलाल मरांडी का दावा है कि पाकुड़ इलाके में एक एकड जमीन के नीचे 40 करोड़ रूपये का कोयला कम्पनियाँ निकालती हैं, जबकि उसी एक एकड़ जमीन के लिए मुआवजा एक से तीन लाख रुपया जमीन मालिकों को सरकार देती हैं.
“मेरी यह मांग है कि यदि कोई अपनी जमीन खदान के लिए देता है तो उसे प्रोडक्शन में हिस्सेदारी मिले. यदि बांध बनाने के लिए जमीन दी जाती है तो जमीन के बदले सरकार जमीन दे और यदि भवन के लिए जमीन ली जाती है तो जमीन मालिकों को उसका किराया मिलना चाहिए. बाकी रेल और सड़क परियोजनाओं के लिए तो लोग खुशी से जमीन देते रहे हैं,” मरांडी ने कहा.
(बाबूलाल मरांडी के और बातें अगले अंक में)

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