भागलपुर के दीप बाबू (1875-1935)–पुण्यतिथि

भागलपुर: समकालीन राजनीतिक और सामजिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि 29 नवम्बर 1935 को भागलपुर के दीप नारायण सिंह की मृत्यु निमोनियां की वजह से नहीं होती तो वे आजाद भारत में एक बहुत ही ऊँचे ओहदे पर होते-शायद भारत के पहले विदेश मंत्री.

उनके समकालीन सचिदानंद सिन्हा लिखते हैं कि आजकी पीढ़ियों को शायद ही इस बात की जानकारी है कि दुनियां के बारे में दीप नारायण सिंह को कितनी जानकारी थी. उन्होंने अपने साठ साल के जीवन में पश्चमी यूरोप के आलवा उत्तर और दक्षिण अमरीका सहित रूस और जापान की कम से कम दो बार यात्रा की थी.

दीप नारायण सिंह की बेटी प्रभावती ने अपने हस्ताक्षर के साथ मुझे एक साक्षात्कार में कहा था कि उनके पिता प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी में गिरफ्तार हो गए थे और सरोजिनी नायडू के भाई की पैरवी पर वे रिहा किये गए.

(1981 में मैं तब भागलपुर विश्वविद्यालय से दीप नारायण सिंह-1875-1935 पर अपना शोध (Ph.d) इंडियन कौंसिल ऑफ़ हिस्टोरिकल रिसर्च के सोजन्य से कर रहा था और मेरे गाइड डॉ सैयद मुहम्मद हबीबुद्दीन थे जो हाल ही में पेन्सिल्वेनिया (अमेरिका) से पढ़कर आये थे.)

प्यार से लोग दीप नारायण सिंह को दीप बाबू के नाम से आज भी बुलाते हैं. उनके पिता तेज नारायण सिंह एक बड़े जमींदार थे. दीप बाबू ने अपनी मृत्यु से पहले ही अपना सबकुछ भागलपुर की जनता के लिए दान कर दिया.

मात्र 13 साल की उम्र में दीप बाबू ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1888 में इलाहबाद में हुए चौथे अधिवेशन में भाग लिया और वहीं उनकी मुलाकात सचिदानंद सिन्हा से हुई जो 1935 में दीप बाबू की मृत्यु तक दोस्त रहे.

फिर 1891 में दीप बाबू इंग्लॅण्ड पढने के लिए चले गए. इंग्लॅण्ड में उनके पिता का अपना एक आढत भी था. बैरिस्टर की डिग्री लेने के बावजूद उन्होंने एक दिन के लिए भी वकालत नहीं की.

भागलपुर आकर उन्होंने 1901 में बंगाल प्रांतीय कांग्रेस के अधिवेशन की अध्यक्षता की. 1906 में वे स्वराज कमिटी के सदस्य बने. महात्मा गाँधी से उनकी मुलाकात 1920 में हुई और 1921 में तिलक स्वराज फण्ड के लिए बैलगाड़ी पर घूमकर उन्होंने भागलपुर से एक लाख रूपये जमा किये.

इससे पहले दीप बाबू ने 1911 में दिल्ली दरबार में शामिल हुए और 1930 में राजेन्द्र बाबू की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने बिहार कांग्रेस का नेतृत्व किया. इसी साल वे गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल ले जाये गए.

भागलपुर के दीप नारायण सिंह की कहानियां और इनके ज्ञान के भंडार इतने रोचक हैं कि आज की पीढी विश्वास नहीं कर पायेगी.

दीप नारायण सिंह भारत के सबसे बेहतरीन ड्रेस्डमेन थे, उनकी तुलना सिर्फ मोतीलाल नेहरू, मजहरुल हक और महात्मा गांधी से की जा सकती है जो अपने जीवन को आजादी की लड़ाई में झोंकने के पहले पहनते थे.

दीप बाबू ने 16 साल तक विश्व का भ्रमण किया. उस समय के लोग कहते थे-“दुनिया में ऐसा कोई द्वीप नहीं, जहाँ दीप नहीं गया.”

(फोटो साभार –गौतम सुमन –फेसबुक दोस्त)

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